Thursday, 21 March 2013

गंगा तेरा पानी मैला...


    

भारत विविधताओं का देश है... चाहे फिर वो संस्कृति की बात हो या फिर धर्मों की ... और शायद यही विविधता भारत को विश्व में एक अलग पहचान भी दिलाती है... भारतीय मानस हर उस चीज़ में आस्था के अक्श को देखते हैं जिससे उन्हें शांति और ईश्वरीय शक्ति की अनुभूती होती है... यही कारण हैं कि भारत में विदेशों से भी लाखों संख्या में हर साल लोग यहां आते हैं..... आस्था की चीज़ों की फेहरिस्त में एक नाम उस नदी का भी है..... जिसे मोक्षदायनी कहा जाता है... जिसके स्नानमात्र से ही यह आभास होता है कि मानो सभी पापों से मुक्ति मिल गई हो.... जो न केवल लाखों लोगों के जीवन का आधार है बल्कि उनकी आस्था की प्यास को भी बुझाती है.... हिंदु धर्म में उसे पवित्र स्थान का दर्जा दिया गया है... जिसके छिड़काव मात्र से ही हर चीज़ पवित्र हो जाती है..... जी हां बात हिमालय की कोख से निकलने वाली गंगा की....
गंगे तव दर्शनार्थ मुक्ति यानि की गंगा के मात्र दर्शन से ही मुक्ति मिल जाती है..... जहां इसकी विशालता मनुष्यों के दुखों और पापों को हर लेती हैं... तो वहीं इसकी चंचल लहरें मन को ...... दरअसल गंगा को भारतीय संस्कृति में मां का दर्जा दिया गया है... इसलिए एक मां होने के नाते भी गंगा अपने मातृत्व के कर्तव्य को निभाती है..... धार्मिक संदर्भों के अलावा गंगा के मां होने का एक सामाजिक संदर्भ भी है.... देश के उत्तर पश्चिमी छोर से निकलते हुए नीचे देश के दक्षिणी पूर्वी भाग तक प्रवाहित होने वाली ये नदी सभी के लिए जीवन जीने का एक आधार है.... यहां की सभ्यता बसने के पीछे का कारण हो या फिर अपने प्रवाह से न जाने कितने ही लोगों की जिंदगी के प्रवाह को आगे बढ़ाना.... सब कुछ इसी मां गंगा की तो देन है........ लेकिन ऐसे में एक अहम सवाल ये खड़ा होता है कि एक मां होने के नाते गंगा ने हमें कितना कुछ दिया... लेकिन क्या हम बेटे का फर्ज़ अदा कर पाए... ? शायद नहीं... क्योंकि गंगा जिसे जीवनदायनी कहा जाता है आज उसका पानी सबसे ज्यादा प्रदूषित हो चुका है.... जिस गंगा और यमुना के मिलने पर पवित्र संगम बनता है...... अब उनकी जगह कागज कारखानों, चीनी मिलों, और शराब कारखानों के दूषित पानी का संगम बनता जा रहा है..... लाखों टन कचरा और सीवेज के पानी से हमने मां गंगा के आंचल को खराब कर दिया है.... मां गंगा के जल में पवित्रता की जो धारा बहती है उसे हम लोगों ने अपवित्र कर दिया है...





आस्था की प्रतीक इस नदी का लोगों ने खूब शोषण किया है.... और यह बदस्तूर अब भी जारी है.... लेकिन इन सब के पीछ कुछ अहम सवाल खड़े होते हैं कि आखिर इसको गंदा करने के पीछे कौन लोग हैं....
कहते हैं आस्था को तर्क के तराजू से नहीं तोला जा सकता ..... ये बात कुछ हद तक सही भी है .... लेकिन जब आस्था गंगा के संदर्भ में हो... तो तर्क भी साथ में ही खड़ा दिखाई देता है.... भागिरथी के रुप में गंगोत्री हिमनद से शुरु होने वाली इस गंगा के पानी की शुद्धता और पवित्रता की जांच वैज्ञानिकों ने भी की...... वैज्ञानिकों की इस खोज़ में ये पाया गया कि पानी में बैक्टीरियोफेज नाम का एक विषाणु है जो जीवाणुओं और दूसरे हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देता हैं.... लिहाज़ा पानी में शुद्धता बढ़ जाती है..... लेकिन लगातार गंगा के पानी में इस तरह से सीवेज का गंदा पानी और प्लास्टिक उत्पादों के डालने से इस विषाणु की क्षमता खत्म होती जा रही है..... जिससे वो पानी जो रोगों को दूर करने के लिए इस्तेमाल में लाया जाता था अब वही पानी रोगों को जन्म दे रहा है..... यानि कहा जाएकि बैक्टीरियोफेज की जगह कोलिफॉर्म जीवाणु ने ली है..... जो बीमारी पैदा करता है..... ताजा शोध के मुताबिक पहाड़ी इलाकों के मुकाबले मैदानी इलाकों में गंगा की हालत ज्यादा खराब है.... वैज्ञानिकों की माने तो कानपुर और इलाहाबाद में पानी में जानलेवा बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु मौजूद हैं.... जरा अब भारत की इन दो तस्वीरों पर गौर कीजिए जहां एक तरफ वो गंगा है जिसका पानी सब नदियों के मुकाबले ज्यादा शुद्ध माना जाता है और वहीं दूसरी तस्वीर डायरिया से मरने वाले हज़ारों बच्चों की है जो हर साल इस दूषित पानी से होने वाले रोग से मरते हैं.... अकेले अगर कानपुर की बात करें तो यहां पर शहर की आबादी ज्यादा होने के कारण रोजाना करीब 75 करोड़ लीटर सीवेज नदी में गिरता है..... दरअसल इस सीवेज में चमड़े और दूसरे कारखानों से निकलने वाला जहरीला पानी और अस्पतालों से निकलने वाला दूषित पानी शामिल होता है..... ऐसे में आप खुद ही ये अंदाजा लगा सकते हैं कि इस तरह से लगातार नदी को प्रदुषित करने से आप अपने लिए ही एक गड्डा खोदने का काम कर रहे हैं....... लेकिन कहीं न कहीं इसके पीछे का बड़ा कारण राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी का है....

तो जाना आपने कि किस तरह से कंपनियों, फैक्टरियों, और कारखानों से निकलने वाला गंदा पानी गंगा नदी में आकर गिर रहा है.. ये सब खुलेआम हो रहा है.. लेकिन फिर भी कुछ क्यों नहीं होता.... बहरहाल इस सवाल का जवाब खोजने के लिए गंगा के ऐतिहासिक महत्व को जानना बेहद जरूरी है.....
गंगा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व भी है.... कबीर ने इसके तट पर ही कई दोहे लिखे.... मिर्जा गालिब ने अपने कई शेरों के कसीदे यहां गढ़े.. इसके अलावा आजाद देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने इस नदी को पल्स ऑफ इंडिया यानि की भारत की नब्ज़ कहा..... गंगा का महत्व सिर्फ आस्था और धर्म तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके प्रवाह पर ही देश की कृषि, पर्यटन, और खेल आधारित हैं... इसके साथ ही जो उद्योग अपनी फैक्टरी का गंदा औऱ विषेला पानी इस नदी में डालते हैं ... वही नदी इनके विकास में अहम भूमिका भी निभाती है.... इसके अलावा भी गंगा शहरों को अपनी जलापूर्ती करती है...... अगर ऐतिहासिक संदर्भ कि बात करें तो कहीं न कहीं पहले से ही भारतीय लोगों की ये धारणा रही है कि गंगा का जल पवित्र है और इसका पानी कभी सड़ता नहीं है..... इसके साथ ही हर हिंदु परिवार में कलश या फिर एक बोतल में गंगा का पानी हमेशा भरा रहता है.... हर संस्कार में हम गंगा के पानी का इस्तेमाल करते हैं.... फिर चाहे वो पूजा के लिए हो, चरणामृत में मिलाने के लिए या मृत्यु नज़दीक होने पर दो बूंद मुंह में डालने के लिए.... इस तरह से देखा जाए तो गंगा का स्थान लोगों के जीवन में कितना अहम रखता है... लेकिन जैसे-जैसे गंगा का ये पानी दूषित होता जा रहा है .. ये तमाम धारणाएं भी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं..... गंगा चूंकि हिमालय से निकलती है ... इस कारण इसमें तमाम हिमालय से जुड़ी चीज़े मिल जाती हैं.... मसलन मिट्टी, और जडीबूटी ... जैसी औषधी वाली चीज़ें जो गंगा के पानी को शुद्ध और पवित्र बनाने में मदद करती हैं..... लेकिन जैसे जैसे ये नदी जमीन पर उतरती है या यूं कहें कि इंसान तक पहुंचती हैं.. इंसान उसे दूषित करने लगता है....


                  

गंगा नदी ... जिसमें न केवल आस्था की धारा बहती है... बल्कि इसके साथ ही इससे कई लोगों का रोजगार जुड़ा है.... ऐसे में अगर इसका पानी दूषित हो जाता है तो कहीं न कहीं इनकी कमाई में भी कमी दिखाई देती है... मछुआरों ही नदी के इंजीनियर और डॉक्टर होते हैं.... नदी में अक्सर मछुआरे अपने जाल के साथ मछली पकड़ते हुए दिख जाते हैं... खासकर ये दृश्य गंगा नदी में ज्यादा दिखाई देता है... लेकिन पिछले कुछ एक सालों से नदी में मछुआरों की संख्या में कमी आई है..... इसके पीछे का कारण है मछलियों की संख्या में कमी.... इस कमी का कारण हैं लगातार बढ़ता प्रदूषण..... मछली में नदी का न होना इस बात की तस्दीक करता है कि नदी अब बुरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है..... नदी को गंदा करने में सबसे ज्यादा योगदान उद्योगों का है ... उसमें भी खासकर चमड़ा उद्योग का .... सरकार की तमाम सख्ती के बावजूद यह उद्योग चोरी-छिपे अपनी गंदगी नदियों में डाल देते हैं.... अगर बात करें उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तो यहां से गंगा में इतना ज्यादा प्रदूषण डाला जाता है कि अपनी अनोखी स्वयं-शुद्धि क्षमता के बावजूद कन्नौज से लगभग 80 किलोमीटर के सफर में भी गंगा अपने को उससे मुक्त नहीं कर पाती.... बैराज से निकलते हलके भूरे पानी में उठते ये झाग इस बात का सबूत है....



- आस्था बनाम प्रदूषण
नदि की कल-कल करती धारा .... जिसकी ध्वनि मात्र से ही मानो ऐसा लगता है जैसे कि वो हमें कुछ कह रही हो.... उस शोर में भी शांति का एक अलग ही अहसास होता है.... और शायद यही वो चीज़ है जो लोगों को गंगा तट पर आने को मजबूर भी करती है..... दरअसल गंगा नाम अपने आप में आस्था का एक पर्याय है..... जैसे ही गंगा का नाम आता है ज़हन में आस्था की लहर सी दौड़ पड़ती है.... दिमाग में उसके ठंडे और पवित्र पानी की एक तस्वीर सी बन जाती है..... कुछ लोग हमेशा से ही गंगा किनारे रहे हैं... इन लोगों में साधू बाबा आते हैं जो गंगा नदी के तट पर ही अपना जीवन बिताते हैं... इसके साथ ही साथ हिंदु धर्मों के लोगों के लिए गंगा जीवन के हर क्षण में किसी न किसी रूप में आती है... ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है आपको... गंगा के प्रति अटूट आस्था को देखना है तो आप हरिद्वार चले जाईए.... सुबह शाम गंगा की आरती और लाखों लोगों की भीड़ काफी है ये बताने के लिए की ये न सिर्फ पानी है बल्कि उससे भी कहीं आगे बढ़कर ये आस्था की वो धारा है जो इश्वरीय शक्ति का एहसास कराती है...  ये तस्वीर वो गंगा के आस्था के रूप को दिखाती है जरा अब आप अपने अवचेतन मन से बाहर आएं..... और देखें कि आस्था की आड़ में आपने गंगा को कितना मैला कर दिया है ... जो लोग गंगा के तट पर पूजा करने आते हैं या फिर किसी संस्कार के लिए आते हैं तो अपनी आंखों पर आस्था की पट्टी लगा लेते हैं .... उन्हें इस बात का बिलकुल भी अंदाजा नहीं होता कि वो जिस गंगा की पूजा कर मनोकामनाएं मांग रहे हैं वो दरअसल उसकी पूजा नहीं बल्कि उसको प्रदूषित करने का काम कर रहे हैं.... पॉलिथीन बैन होने के बावजूद भी जैसे-तैसे गंगा किनारे इनके दर्शन हो ही जाते हैं... इतना ही नहीं कुछ लोग छोटे बच्चों के शवों को इसमें बहा देते हैं.... जिसके कारण भी गंगा मैली होती है.......... लेकिन ये सब तो वो लोग करते हैं जो गंगा में आस्था रखते हैं..... लेकिन सबसे ज्यादा गंगा के प्रदूषित होने का कारण हैं उद्योग... जिसमें से निकलने वाला हानिकारक कैमिकल और गंदा पानी सीधा गंगा में डाला जाता है.... उद्योगों में खासकर चमड़ा कारखानाजो गंगा को ज्यादा  प्रदूषित करता है......... कारखानों से जो गंदा पानी निकलता है उसमें क्रोमियम की मात्रा लगभग 124 मिलीग्राम प्रति लीटर होती है..... जो तय मात्रा से 62 गुना ज्यादा है.... अब जरा कल्पना कीजिए कि चमड़ा कारखानों से निकलता क्रोमियम गंगा के निर्मल पानी में मिल जाता होगा तो इसका रंग तो बदलेगा ही साथ ही साथ इसकी शुद्धता पर भी असर पड़ेगा.... ऐसा नहीं है कि इस दुनिया में सारे लोग ही ऐसे हैं जिन पर गंगा को दूषित करने का आरोप लगा है... बल्कि ऐसे भी कई धार्मिक और सामाजिक लोग हैं... जिन्होनें गंगा में बढ़ते इस प्रदूषण को खत्म करने का बीड़ा उठाया है.... समाज में जागरुक्ता लाने का काम किया है.... और इन लोगों में सबसे पहले नाम आता है ..... डॉ. जीडी अग्रवाल का .... अग्रवाल काफी समय से नदियों के संरक्षण के लिए लड़ते रहे हैं...... अग्रवाल विख्यात पर्यावरणविद और आईआईटी के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं जो लगातार गंगा के शुद्धिकरण को लेकर अनशन कर रहे हैं.... आईए आपको बताते हैं कि आखिर कौन हैं जीडी अग्रवाल....



जीडी अग्रवाल-
•             वर्ष 1932 में उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में जन्में
•             स्थानीय सरकारी स्कूल में शिक्षा के बाद रूढ़की विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग से बीटैक की
•             कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय से पर्यावरणीय इंजीनियरिंग में पीएचडी की
•             आईआईटी कानपुर में सिविल और पर्यावरणीय इंजीनियरिंग के अध्यापन, विभागाध्यक्ष भी रहे
•             केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सदस्य-सचिव बने
•             कई सरकारी समितियों का हिस्सा रहे
•             11 जून, 2011 को संन्यास ग्रहण किया
•             तीस जून 2008 को भागीरथी के संरक्षण के लिए पहला अनशन किया
•             भागीरथी के लिए 14 जनवरी 2009 को दोबारा 38 दिन तक अनशन किया
•             15 जनवरी को फिर से आमरण अनशन शुरू, सेहत बिगड़ने के बाद उन्हें 19 मार्च को एम्स में लाया गया

पर्यावरण के मुद्दे और नदियों के संरक्षण को लेकर प्रोफ़ेसर अग्रवाल की जंग बहुत पुरानी है.... साल 1932 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में जन्में डॉक्टर अग्रवाल ने शुरूआती शिक्षा स्थानीय सरकारी स्कूल में ही हुई थी... पढ़ाई का ही ये जुनून था कि वो पढ़ने के लिए अमेरिका तक चले गए... कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय से उन्होंने पर्यावरणीय इंजीनियरिंग में पीएचडी की उपाधि हासिल की.... इससे पहले उन्होंने रूढ़की विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी.... लंबे समय तक सिविल और पर्यावरणीय इंजीनियरिंग के अध्यापक के तौर पर डॉक्टर अग्रवाल ने आईआईटी कानपुर में काम किया और इस विभाग के प्रमुख भी रहे.... इसके साथ ही वो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सदस्य-सचिव भी थे.... और कई सरकारी समितियों का हिस्सा रह चुके हैं..... जीडी अग्रवाल हमेशा से नदियों के संरक्षण के लिए संघर्ष करते रहे हैं….. गंगोत्री से उत्तरकाशी तक भागीरथी नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बहने देने के लिए उन्होनें आमरण अनशन किया था… 18 दिन तक चले उनके इस अनशन को उत्तराखंड सरकार ने 30 जून 2008 को भैरों घाटी और पाला-मनेरी जल विद्युत परियोजनाओं को स्थगित कर समाप्त कराया..... इतना ही नहीं केंद्र सरकार ने भी भागीरथी के प्रवाह को बाधित ना करने का लिखित आश्वासन दिया था... लेकिन बाद में डॉक्टर अग्रवाल ने केंद्र सरकार पर अपने लिखित आश्वासन से पलटने का आरोप लगाया और फिर से 14 जनवरी 2009 को अनशन पर बैठ गए... अनशन पर बैठने का उनका ये सिलसिला अभी भी जारी है.... आपको बता दें कि डॉक्टर अग्रवाल ने पिछले वर्ष 11 जून को संन्यास ग्रहण कर लिया था जिसके बाद उन्होंने अपना नाम स्वामी ज्ञानस्वरूप आनंद रख लिया था.... डॉक्टर अग्रवाल से स्वामी ज्ञानस्वरूप आनंद बनने तक के उनके सफर में उन्होनें गंगा के लिए कई आंदोलन किए.... लेकिन सरकार की तरफ से इस मामले में संवेदनशीलता न दिखाना सिर्फ इस समाजसेवी का अपमान नहीं है बल्कि इसके साथ-साथ गंगा मां का भी अपमान है...
तो जाना आपने कि किस तरह से लालफीताशाही की भेंट चढ़ी इस गंगा को साफ करने के लिए भी न जाने कितने ही पैसे बहाए गए लेकिन आज इसका पानी पहले से और ज्यादा दूषित हो चुका है....  शायद इसके लिए वो समाज जो गंगा में आस्था तो रखता है लेकिन उसकी आड़ में उसे गंदा कर रहा है.... इसके साथ ही वो सरकार जो इसकी सफाई के लिए तमाम नियम कायदे तो बनाती है लेकिन वो उनकी अकुशलता के चलते अमल में नहीं ला पाती।


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