Wednesday, 13 March 2013

ईमांदारी के बदले मौत ! (Part-3)





दूबे और मंजूनाथ को उनकी इमांदारी की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी..... इनके साथ हुए हादसे को देखकर मन में विचारों का द्वंद उठने लगता है...... गुस्सा और डर दोनों ज़हन में एक साथ अपनी जगह बना लेते हैं.... कुछ ऐसा ही होता है नरेंद्र कुमार की कहानी को सुनकर... वही नरेंद्र जिसने अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई और बदले में उसे मिली मौत.... जी हां.. मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के बानमेर कस्बे में बतौर सब डिविज़नल ऑफिसर तैनात नरेंद्र अपनी इमांदारी के लिए पूरे ईलाके में जाने जाते थे.... उनकी इस इमांदारी के कुछ लोग मुरीद थे तो वहीं कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें उनकी ये इमांदारी कांटो की तरह चुभती थी.... और ये लोग कोई और नहीं बल्कि खनन माफिया थे.... 1979 में जन्में नरेंद्र कुमार ने अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की.... अपनी मेहनत और लगन के बूते उन्होनें देश की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन परीक्षा को पास कर लिया.... और बन गए भारतीय पुलिस सेवाधिकारी.... बतौर आईएएस 2009 में उनकी पोस्टिंग सबसे पहले बिहार और फिर उज्जैन में हुई.... यहां उन्होनें अपनी महनत और ईमांदारी के साथ काम किया.... बाद में उनकी पोस्टिंग मध्यप्रदेश के मोरेना जिले में कर दी गई... नरेंद्र शादीशुदा थे... उनकी पत्नि मधुरानी तेवातिया खुद भारतीय प्रशासनिक सेवाधिकारी हैं.... दूबे और मंजूनाथ की तरह ही नरेंद्र ने भी अपने भीतर के ईमांदारी की लौ को कभी बुझने नहीं दिया....  8 मार्च साल 2012 ये वो वक्त था जब नरेंद्रकुमार बानमोर में होली के इंतजाम के लिए अपने ड्राईवर ऋषभ करारे, कांस्टेबल चंद्रपालसिंह, राजकुमार और रतन के साथ दोपहर में निकले थे.... भिंड रोड पर पेट्रोल पंप के पास उन्होंने एक ट्रैक्टर ट्राली को बानमोर की तरफ निकलते हुए देखा.... ट्रैक्टर को देखते ही उन्हें यह शक हुआ कि कोई अवैध खनन कर के ले जा रहा है.... उन्होंने जब उस ट्रैक्टर को रोकने की कोशिश की तो ट्रैक्टर के ड्राईवर ने ट्रैक्टर को वेयर हाउस रोड पर मोड़ दिया.... लिहाज़ा अपनी जान की परवा किए बगैर .... नरेंद्र ट्रैक्टर पर चढ़ गए.... उनका ये हौसला काफी था ये बताने के लिए कि वो अपनी ईमांदारी को किसी भी हालत में दांव पर नहीं लगाएंगे...... ड्राईवर ने उन्हें झटका दिया, लात मारी... इसके चलते वो वहीं गिर गए और ट्रैक्टर का पहिए उन पर चढ़ गया... इस तरह से नरेंद्र ने अपनी ईमांदारी की कीमत अपनी जान देकर चुकाई... ट्रैक्टर का ड्राईवर जिसका नाम मनोज था वो भागने लगा जिसे कांस्टेबल रतन और राजकुमार ने मौकाए वारदात पर ही धर दबोचा.... हालांकि न ही अवैध खनन बंद हुआ और न ही खनन माफिया के खिलाफ प्रदेश पुलिस ने कोई भी कार्रवाई की... इससे ये साफ पता चलता है कि कहीं न कहीं राजनेताओ, माफियों और नौकरशाहों का ये गठजोड़ बहुत ही ताकतवर होता जा रहा है.... 

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